कारगिल विजय दिवस के 21 साल: इन जवानों ने गोली लगने के बाद भी नहीं छो़ड़ी युद्धभूमि

कारगिल के युद्ध को 21 साल हो चुके हैं लेकिन आज भी उस दिन को याद करके लोगों की आंखें नम हो जाती है। 26 जुलाई हर भारतीय के लिए गर्व का दिन है क्योंकि इस दिन हमारे भारतीय सैनिकों ने कारगिल पर विजय हासिल कर वहां देश का झंडा लहराया था।

लेकिन 26 जुलाई तो अभी दूर है, अभी हम क्यों कारगिल विजय दिवस की बात कर रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि कारगिर पर फतह हासिल करने से पहले टाइगर हिल पर भारतीय सैनिकों ने कब्जा किया था, जिसे ऑपरेशन विजय के तहत रखा गया था। चार जुलाई को ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने टाइगर हिल पर जीत हासिल की थी।

ढाई महीने तक चले इस युद्ध में देश ने अपने 527 से ज्यादा सपूतों को खोया था और 1,300 से ज्यादा वीर योद्धा घायल हो गए थे। हर साल 26 जुलाई के दिन मनाया जाने वाला विजय दिवस दरअसल ऑपरेशन विजय के सफल होने के बाद मनाया जाता है। चार जुलाई के बीच ही भारत ने टाइगर हिल फतह की थी। आइए जानते हैं कि ऑपरेशन विजय में किन वीर सपूतों ने अपना योगदान दिया था।

ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव को ‘घातक’ कमांडो पलटन के नेतृत्व में टाइगर हिल के अतिमहत्वपूर्ण दुश्मन के तीन बंकरों पर कब्जा करने का दायित्व सौंपा गया था। 16,500 फीट की ऊंचाई जो कि बर्फ से ढकी थी और चट्टानों से घिरी थी। योगेंद्र सिंह यादव ने अपनी टीम का नेतृत्व करने का फैसला किया और सदस्यों के लिए चट्टानों पर रस्सी बांधने का काम किया।

 

जैसे ही दुश्मनों ने देखा कि भारतीय टीम पहाड़ी की ऊपर चढ़ रही है उन्होंने वहां से गोलीबारी, ग्रेनेड और तोप चलानी शुरू कर दीं। जगह के गुरुत्वाकर्षण को देखते हुए योगेंद्र सिंह और उनकी टीम ने रेंगते हुए शांति से पहाड़ी पर चढ़ना शुरू किया लेकिन इस दौरान वो गोलियां लगने की वजह से घायल हो गए थे।

हालांकि योगेंद्र सिंह यादव चार दुश्मनों को मार गिराने में सफल हुए, लेकिन योगेंद्र यादव को 15 गोली लगी थी और उसके बाद भी उन्होंने युद्ध का मैदान ना छोड़ने के लिए कहा था। योगेंद्र सिंह यादव की वीरता की वजह से भारत टाइगर हिल कब्जाने में सफल रहा और इसके लिए योगेंद्र सिंह यादव को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

चार जुलाई 1999 यानि ऑपरेशन विजय के दौरान 17 जेएटी की डेल्टा कंपनी को मेजर दीपक रामपाल के नेतृत्व में व्हैल-ब्लैक, प्वाइंट 4875 का एक हिस्सा को कब्जाने का काम दिया गया। व्हैल-ब्लैक एक ऐसी जगह हैं जहां से मश्कोह घाटी पर निगरानी रखी जा सकती है। यहां से दुश्मनों से तोपों के जरिए गोलीबारी की थी।

चार जुलाई 1999 को रात दस बजे दीपक रामपाल ने आगे आकर हमला करने की रणनीति बनाई। चार घंटे के लगातार युद्ध के बाद दीपक रामपाल की टीम ने दुश्मन के पांच जवानों को मार गिराया था। व्हैल ब्लैक के दूसरी तरफ दुश्मनों के 30-40 सैनिक तैनात थे और वो काउंटर अटैक करने की योजना बना रहे थे।

उसी दिन दुश्मनों की ओर से दो बार काउंटर अटैक किया गया लेकिन दीपक रामपाल ने दुश्मनों को खदेड़ डाला। इससे पिंपल कॉम्पलेक्स को कब्जाने में मदद मिली और पाकिस्तान के पांच जवान मारे गए। दीपक रामपाल के वीर कार्य के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

नोट : ताजातरीन ख़बरों के लिए अभी फॉलो करे newsacb7.com फेसबुक इंस्टाग्राम ट्विटर और यूट्यूब। 

 

अपने मोबाइल पर सबसे पहले नोटिफिकेशन पाने के लिए वेबसाइट में नीचे दिए गए Addtoscreen बटन पर क्लिक करे और पाए सबसे पहले तजा ख़बरों की नोटिफिकेशन आपके मोबाइल पर। 

Leave a Reply

%d bloggers like this: