आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं वह मंजर याद करकेसंस्मरण

आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं वह मंजर याद करके संस्मरण
-छह दिसंबर 1992 को वह दिन कभी नहीं भूल सकते: पं.सुनील भराला
-तमाम प्रतिबंधों के बावजूद पुलिस को चकमा देकर पहुंचे थे अयोध्या
-उ.प्र. सरकार लिखी कार से वेष बदलकर गर्भगृह तक पहुंचा जत्था
-जेब में थे मात्र बीस रुपये, वापस घर पहुंचने को झेलनी पड़ी मुसीबतें

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मेरठ। 06 दिसंबर 1992 का अयोध्या का वो मंजर याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। एक धक्का जोर से…और जय श्री राम के नारों के साथ जैसे ही कारसेवकों ने गैंती, हैंडपंप की हत्थी और अन्य चीजों से प्रहार शुरू किये तो देखते ही देखते विवादित ढांचा तहस-नहस हो गया। इसके बाद मची भगदड़ और पैदा हुए हालात को तो हम जीवनभर नहीं भूल पाएंगे। न जेब में पैसा, न ठहरने की कोई व्यवस्था। न घर की चिंता और न परिवार की।

मन में अगर कुछ था तो बस राम का मंदिर। चाहे कुछ हो या न हो, मंदिर जरूर बनना चाहिए। इसी संकल्प के साथ हमारी टीम सारी बाधाएं पार करके आयोध्या में गर्भगृह तक पहुंच गई। रास्ते में जगह-जगह पुलिस ने रोककर जांच पड़ताल की, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार लिखी एंबेडसडर कार में सवार हमारी टीम को पुलिस पहचान ही नहीं सकी कि हम कारसेवक हैं। पुलिस को चकमा देने के लिए हमें कुर्ता-पायजामा उतारकर पेंट-शर्ट भी पहननी पड़ीं। सारे जतन करने के बाद आखिर, हम अपने मकसद में कामयाब हो गए।

यह बात अलग है कि वापस आते समय हम सभी साथी इधर-उधर हो गए। घर पहुंचने के लिए न केवल घंटों तक पैदल दौड़ना पड़ा बल्कि अनेक मुसीबतें भी झेलनी पड़ीं।
यह संस्मरण सुनाते-सुनाते पंडित सुनील भराला पुरानी यादों में खो जाते हैं। वर्तमान में उत्तर प्रदेश श्रम कल्याण परिषद के चेयरमैन राज्यमंत्री पं.सुनील भराला ने मंगलवार को इस संवाददाता के साथ एक भेंटवार्ता में अयोध्या में कारसेवा की 28 साल पुरानी यादें ताजा कीं।

उस समय वह भाजयुमो दौराला मंडल के अध्यक्ष थे। न शहर के भाजपा नेताओं के बारे में बहुत अधिक जानकारी थी और न ही राजनीतिक परिपक्वता। बचपन से संघ से जुड़े थे तो मन में बस राम मंदिर की चाह थी। वह बताते हैं कि छह दिसंबर को कारसेवा के कार्यक्रम को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने कारसेवकों को रोकने के लिए जगह-जगह बैरियर लगा दिये थे। अधिकांश ट्रेनें और अयोध्या पहुंचने वाले सभी साधन बंद कर दिये थे।

अनेक स्थानों पर अस्थाई जेल बनाकर कारसेवकों को रोकने और इन जेलों में बंद करना शुरू कर दिया। मेरठ के अधिकांश कारसेवक अयोध्या नहीं पहुंच सके। उन्हें रास्ते में ही गिरफ्तार कर अस्थाई जेलों में बंद कर दिया गया।

पं.सुनील भराला बताते हैं कि दौराला मंडल से हमारी टीम पुलिस-प्रशासन को चकमा देकर अयोध्या में गर्भगृह तक पहुंच गई। भराला गांव के ही रमेश गुप्ता प्रधान भरा ला जी की एंबेसडर कार से हम लोग अयोध्या के लिए चले। कार में रमेश प्रधान जी, सुनील भराला, विहिप नेता पुरुषोत्तम उपाध्याय, ठा.ओमकार चौहान आदि थे।

रास्ते में ही हमने कुर्ता-पायजामा उतारकर पेंट-शर्ट पहन ली, ताकि पुलिस को कारसेवक होने का शक न हो। जिस एंबेसडर कार से हम अयोध्या गये थे, उस पर उत्तर प्रदेश सरकार लिखा था, जिस कारण हापुड़, गढ़मुक्तेश्वर और कई अन्य स्थानों पर कड़ी चेकिंग के बावजूद हम अयोध्या पहुंच गए। मेरठ से अयोध्या पहुंचने वाले अन्य नेताओं में रविंद्र पुंडीर, विधायक तत्कालिक पूर्व प्रत्याशी भाजपा महावीर त्यागी, तत्कालिक जिला अध्यक्ष भाजपा सतीश महाना, प्रेमसिंह मैथना, मांगेराम शर्मा आदि अनेक लोग थे। देशभर से बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंच चुके थे।

छह दिसंबर को गर्भगृह की कमान डा.दिनेश शर्मा जी (वर्तमान में उप मुख्यमंत्री) और ऋतंभरा जी ने संभाल रखी थी। वहां भाजपा के अनेक वरिष्ठ नेता मौजूद थे। सभा के दौरान जैसे ही एक धक्का जोर से और जय श्री राम के नारे गूंजने शुरू हुए तो कारसेवक विवादित ढांचे तक पहुंच गए और गैंती,

हैंडपंप के हत्थे और अन्य चीजों से हमला करके पूरा ढांचा पलभर में ध्वस्त कर दिया। इसके बाद कारसेवकों में विवादित ढांचे की निशानी (मलबे के पत्थर) लेने की होड़ लग गई। हम भी वहां से एक मलबे का टुकड़ा लेकर आये जो आज भी रखा है। इसके बाद पुलिस के हमले से मची भगदड़ में लोग एक-दूसरे से बिछुड़ गए। अपनी जान बचाने के लिए जिसे जो भी रास्ता दिखायी दिया, वह उसी पर चल पड़ा। हमें भी घंटों तक जंगलों में दौड़ लगानी पड़ी। जेब में सिर्फ 20 रुपये थे, जिनसे घर तक नहीं पहुंच सकते थे। सारे साथी वहीं बिछुड़ गए। जैसे-तैसे हम लोग वापस मेरठ पहुंचे। पं.सुनील भराला बताते हैं कि वह दिन कभी भुलाया नहीं जा सकता। अब 28 साल बाद वह घड़ी आयी है, जब अयोध्या में राम मंदिर बन रहा है।

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