जस्टिस गोगोई पर बात करने वालों को क्या जस्टिस रंगनाथ मिश्रा याद नहीं ?

पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली का एक बयान आज सोशल मीडिया पर ख़ूब शेयर हो रहा है.

30 सितंबर 2012 में दिए इस बयान में वो कह रहे हैं, “दो तरह के जज होते है. एक जो क़ानून जानते है और दूसरे जो क़ानून मंत्री को जानते हैं. जज रिटायर नहीं होना चाहते हैं. रिटायर होने से पहले दिए फ़ैसले रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले काम से प्रभावित होते हैं.

सोमवार को राष्ट्रपति की ओर से पूर्व चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई को राज्यसभा में मनोनीत किया गया. इसके बाद से ही अरुण जेटली का बयान वायरल हो रहा है.

और इस संदर्भ में जस्टिस रंजन गोगोई के पूर्व फ़ैसलों का ज़िक्र भी ख़ूब हो रहा है.

टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने ट्विटर पर लिखा है कि वो राष्ट्रपति के इस फ़ैसले से बिल्कुल हैरान नहीं हैं. इसके साथ ही उन्होंने ट्विटर पर उन फ़ैसलों का जिक्र किया जो पद पर रहते हुए जस्टिस रंजन गोगोई सुनाए.

जवाब में कई लोगों ने महुआ मोइत्रा को पूर्व जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को याद करने की सलाह भी दी.

आख़िर कौन हैं जस्टिस रंगनाथ मिश्रा

दरअसल जस्टिस गोगोई से पहले जस्टिस रंगनाथ मिश्रा भी राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं.

जुलाई 1998 में कांग्रेस ने ओडिशा से उन्हें राज्यसभा भेजा था. वो 2004 तक राज्यसभा सांसद रहे.

लेकिन जस्टिस मिश्रा का मामला जस्टिस गोगोई से थोड़ा अलग है. उन्हें राष्ट्रपति ने नामित नहीं किया था बल्कि कांग्रेस पार्टी की तरफ से वो राज्यसभा भेजे गए थे.

कांग्रेस का कहना है कि यही वो बात है जो जस्टिस रंगनाथ की राज्यसभा सदस्यता को जस्टिस गोगोई की सदस्यता से अलग करती है.

कांग्रेस के इस बार के राज्यसभा उम्मीदवार केटीएस तुलसी ने इस बारे में बीबीसी से बातचीत की.

जेटली के बयान का ज़िक्र करते हुए केटीएस तुलसी ने कहा, “न्याय व्यवस्था दुरुस्त रहे और कोई पक्षपात न हो इसके लिए ख़ुद अरुण जेटली ने कहा था कि जजों के रिटायरमेंट और दूसरे पद देने में कम से कम दो साल का अंतर हो. आज वही सरकार अपने पुराने नेताओं की बात को अमल में नहीं ला रही है.”

कांग्रेस का पक्ष रखते हुए केटीएस तुलसी ने राष्ट्रपति के इस फ़ैसले का न सिर्फ़ जस्टिस गोगोई के फ़ैसलों से लेना देना है बल्कि जिस स्पीड से उन्हें ये दिया गया है वो भी सवालों के घेरे से परे नहीं है.

ग़ौरतलब है कि जस्टिस गोगोई 2019 में नवंबर में रिटायर हुए हैं और मार्च के महीने में ही राष्ट्रपति ने उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत कर दिया है.

रंगनाथ मिश्रा के फ़ैसले

सवाल रंगनाथ मिश्रा के फ़ैसलों को लेकर भी उठे थे.

1984 के दंगों पर किताब लिखने वाले मनोज मिट्टा की मानें तो जस्टिस रंगनाथ मिश्रा के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि है 1984 के दंगों की वो रिपोर्ट जिसमें कांग्रेस को एक तरह से क्लीन चिट दी गई थी.

मनोज मिट्टा वरिष्ठ पत्रकार हैं और 1984 के दंगों पर किताब When a Tree shook Delhi, लिखी है. उस किताब में भी उन्होंने रंगनाथ मिश्रा की रिपोर्ट का ज़िक्र किया है.

बीबीसी से बातचीत में मनोज मिट्टा ने बताया, “ऐसा नहीं था कि रंगनाथ मिश्रा कमेटी का गठन राजीव गांधी सरकार ने स्वत: ही कर दिया था. उन पर दबाव बनाया गया था, अकाली दल के नेता हरचंद सिंह लोंगोवाल ने.”

मनोज मिट्टा कहते हैं कि सरकार से कोई भी पक्ष बातचीत के लिए तैयार नहीं था जब तक वो एक निष्पक्ष जांच का एलान नहीं करते. इसी मांग को लेकर अप्रैल 1985 में एक सदस्यीय कमेटी रंगनाथ कमेटी का एलान किया गया था. सरकार ने जब रंगानाथ कमेटी की घोषणा की उसके बाद ही अकाली दल ने अपना प्रदर्शन बंद किया

 

रंगनाथ मिश्रा कमेटी रिपोर्ट

पहले दिन से ही कमेटी ने “इनकैमरा इंक्वायरी” शुरू की. उस वक्त टीवी कैमरे होते नहीं थे. पब्लिक को इसमें आने की इजाज़त नहीं थी. इस कमेटी ने पूरी इंक्वायरी को बहुत ही सीक्रेट तरीक़े से पूरा किया. हालांकि कमेटी ने रिपोर्ट 1986 में दे दी थी, लेकिन 1987 में इसे संसद में पेश किया गया और इस पर चर्चा तक नहीं हुई.

मनोज मिट्टा ने बीबीसी को बताया कमेटी पर लोगों का भरोसा जांच के दौरान ही उठ गया था. इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा 1984 के दंगों में पीड़ितों का पक्ष रखने के लिए बनी सिटिजन जस्टिस कमेटी ने इस रंगनाथ मिश्रा कमेटी के सामने अपना पक्ष रखने से इनकार कर दिया था क्योंकि उन्हें रंगनाथ मिश्रा कमेटी से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं थी.

कमेटी की रिपोर्ट पर चर्चा हुई? उस पर क्या टिप्पणी हुई? इस सवाल के जवाब में मनोज मिट्टा कहते हैं कि फरवरी 1987 में राजीव गांधी सरकार ने संसद में रिपोर्ट पेश की. कांग्रेस के सभी नेताओं को क्लीन चिट दी गई. लेकिन पूर्ण बहुमत वाली सरकार होने बावजूद सरकार ने रिपोर्ट पर बहस नहीं कराई, चर्चा की सरकार ने इजाज़त नहीं दी.

मनोज मिट्टा के मुताबिक़, “सरकार ने रंगनाथ कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर एक एक्शन टेकन रिपोर्ट भी सदन में रखा. इतना ही नहीं कमेटी की सिफारिश पर तीन और कमेटी का गठन भी किया ताकि जांच आगे बढ़ाई जा सके.

इसके साथ ही कुछ घटनाओं का ज़िक्र करते हुए मिश्रा ने दावा किया कि अगर कांग्रेस हिंसा को बढ़ावा देती, तो दिल्ली में कहीं भी पुलिस या नागरिक समाज के लिए बदतर हुए हालात को संभालना मुश्किल होता.

मनोज मिट्टा के मुताबिक़ रिपोर्ट में ये भी कहा गया , “अगर कांग्रेस पार्टी या पार्टी के किसी ताक़तवर धड़े ने कोई भूमिका निभाई भी होती तो ये उस तरह से इसे अंजाम नहीं दे सकते थे जिसके लिए उन्हें उत्तरदायी ठहराया गया है.”

क्या रंगनाथ कमेटी की एकतरफा रिपोर्ट पर ही उन्हें कांग्रेस ने राज्यसभा का टिकट दिया? इस पर केटीएस तुलसी कहते हैं कांग्रेस ने जस्टिस रंगनाथ को मुख्यन्यायधीश के पद से रिटायर होने के सालों बाद राज्यसभा का टिकट दिया था और वो चुनाव के रास्ते राज्यसभा पहुंचे थे, ना कि नामित होकर. दोनों में बहुत फर्क है.

रंगनाथ मिश्रा का राजनीतिक सफर

जिस वक्त रंगनाथ मिश्रा कमेटी गठित की गई थी, तब वो सुप्रीम कोर्ट के जज थे.

इसके बाद सितंबर 1990 में जस्टिस मिश्रा भारत का मुख्य न्यायाधीश बने.

नंवबर 1991 में वो मुख्य न्यायधीश के पद से रिटायर हुए.

तकरीबन दो साल बाद सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन हुआ. इस आयोग के सबसे पहले अध्यक्ष जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को बनाया गया.

उस वक्त भी उनके नाम के एलान के बाद कई सवाल उठे. वो तकरीबन तीन साल इस पद पर बने रहे.

इसके पांच साल बाद 1998 में जस्टिस मिश्रा को कांग्रेस ने ओडिशा से राज्यसभा भेजा

 

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